जो पी रहे है, वो मदहोश नहीं है

जो सो रहे है, वो बेहोश नहीं है
मर चुके है ये डूब डूब के गम में

पीने वालों, सोने वालों में अब जोश नहीं है
जो हम पे गुज़री, सो दूसरा क्या समझेगा

खैर इस दूसरे का भी तो कोई दोष नहीं है
मनमर्ज़ी से सहरा में चलकर, खुद को रुलाया है हमने

हमें बेचारा मत बोलो, हमें खुदा पर कोई रोष नहीं है
जिसके घर में आती हो, हज़ार तरीको से रोशनी

अगर भूल जाये अँधेरा तो कोई दोष नहीं है

©I A M A N K Y T

ZID KE KAARNAAME(ज़िद के कारनामे)

ज़िद में बहकर चाहती किनारा खो चले

पतवार वाले अपनी नाव खो चले
रात तूफान से तो बच गये जैसे-तैसे

सुबह कब हुई, क्या पता, अपनी आँख खो चले
शेखीयत का हमारी, आप यूँ अंदाजा लगाये

खामोश रहकर, हम दिख रही मदद खो चले
ज़मीन पर पहुँचे या पानी में है, पता नहीं लगता

कहीं ऐसा तो नहीं कि गहरे पानी में सो चले
ये जो अब कुछ दिखा है हमें, ये मौत है

ये बेजान शरीर पानी के कंधो पे खो चले

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Naqaab

अब क्या शिकायत करें हम अपने नवाब से

खो गया खुद को, टकरा के हसीन शबाब से
घर के परदों से चेहरा सटाने लग गया

कहे आवै खुशबू गुलाब की, उसके हिजाब से
हफ़्तों हफ़्तों शराब पीकर इतना मदहोश हुआ है

रात को निकलने को कहने लगा आफ़्ताब से
कुछ लगा है सीधा जाकर दिल पर उसके

पहले तो ना पूछे कभी जख्म कबाब से
कभी तो लौटेगा वो फिर से शहर में मेरे

उसके लिये रिफाकत की है मैंने नक़ाब से

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HIMMAT

शायद एक कबाड़ी, मुझमें देखा है उसने

दिल का टूटा-फूटा सामान मुझ पर फेंका है उसने
कोई खास खुशी


 होती होगी, दिल का वजन हल्का करके

महीनों बाद फिर से, मुझे सोचा है उसने
रुमाल लेकर फिर चल पड़े उनके शहर में

बस इतना ही करने को बोला है उसने
चला आज ‘अंकित’ लेकर एक फूल साथ में

कोई नया रास्ता शायद खोजा है इसने
ये जानता है कि दूर से देख ही पिघल जाएगा

मोम को पत्थरों से बाँधा है इसने

Activities

चलने लगा तो रुकना, रुकने लगा तो चलना चाहा

जितना जिया उतना मरना, जितना मरा उतना जीना चाहा
मैंने देखा कि शेर खा गया मासूम खरगोश को

ना जाने क्यों मैंने खुदा बनना चाहा
नीम की पत्तियां रख दी साथ चीनी के

चींटियों ने जब भी पेट भरना चाहा
आँधियों ने तिनके मार फेंके आँखों में मेरी

जब भी मैंने घर से बाहर निकलना चाहा
हमने कहा तो नहीं, मगर आप समझ तो सकते थे

क्यों हर बार सामने आपके हमने टिकना चाहा

©I A M A N K Y T